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बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

कैसे-कैसे पत्रकार

 उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को पटना व दिल्ली के बाद पत्रकारों का गढ कहा जाता है। राजधानी होने की वजह से यहां पर पत्रकारों की एक बडी फौज है। तीन सौ से ज्यादा पत्रकारों को राज्य सरकार ने बाकायदे राज्य मुख्यालय की मान्यता दे रखी है। जिले स्तर पर भी करीब 50 पत्रकारों को मान्यता दी गयी है। प्रमुख दैनिक व साप्ताहिक समाचार पत्रों व टीवी चैनल के अलावा इस शहर में कितने समाचार पत्र महज कागजों में छप रहे हैं हो सकता है सूचना विभाग को भी इनके बारे में न पता हो। किसी को पत्रकार बनने के लिए कोई डिग्री की जरुरत नहीं है। जो चाहे वह आसानी एक समाचार पत्र का पंजीकरण कराकर खुद को सम्पादक घोषित कर ले। सरकार भी उसे ऐसा करने से नहीं रोक सकती है। पत्रकारों की बढती भीड से पूरी पत्रकार बिरादरी चिन्तित है। कहा जा रहा है कि इस भीड की वजह से पत्रकारों का समाज में स्तर गिर रहा है। पत्रकारों को लोग अब अच्छी नजर से नहीं देख रहे हैं, यह निहायत ही चिन्तनीय है। किसी सडक पर खडे होकर दस मिनट तक नजर दौडायें तो देखेंगे वहां से गुजरने वाली दस गाडियों में से एक पर प्रेस लिखा हुआ रहता है। अपराध की एक पत्रिका निकालने वाले एक सम्पादक ने कितनी गाडियों पर पत्रिका का नाम छपवा रखा है शायद उन्हें भी नहीं पता होगा। इसी तरह तमाम पत्रकार अपने नाते रिश्तेदारों व मित्रों की गाडियों पर प्रेस लिखवा दिये हैं ताकि पुलिस कहीं उन्हें न रोके। यदि कहीं पर पुलिस रोकने की कोशिश करती है तो पत्रकार का रौब अलग गांठते हैं। मेरे एक पत्रकार मित्र आसिफ की गाडी से हजरतगंज में एक गाडी से पिछले दिनों मामूली टक्कर हो गयी। आसिफ को उस प्रेस लिखी गाडी पर बैठा व्यक्ति पत्रकार का रौब गांठकर आधे घंटे से ज्यादा देर तक परेशान कियाा। बाद में जब असलियत खुली तो पता चला कि वह खुद नहीं बल्कि उसका कोई जानने वाले एक पत्रिका निकालते हैं। वुᆬछ छुटभैये फर्जी पत्रकार नामी गिरामी पत्रकारों का नाम लेकर लोगों को धमकाने से भी नहीं चूकते। एशियन ऐज की विशेष संवाददाता आमता वर्मा के साथ घटी घटना महज एक बानगी है। एक पत्रकार ने एचसीएल कम्पनी की पत्रकार वार्ता में अपने को एशियन ऐज का पत्रकार बता दिया। यही नहीं एक एक व्यक्ति अपने को एशियन ऐज का पत्रकार बताकर इसी शहर में एक मकान पर कब्जा कर लिया था। बाद में इसकी शिकायत एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल से की गयी तब मामला सुलटा। इस तरह की एक घटना तो मेरे साथ भी घटी। मेरे पत्रकार मिश्र श्रीधर जी एक बार कानपुर से लौट रहे थे। चारबाग स्टेशन पर उन्होंने एक व्यक्ति की स्वूᆬटर से लिपत्ट ली। स्वूᆬटर वाले व्यक्ति ने अपने को राष्ट्रीय सहारा का पत्रकार देवकी नन्दन मिश्र बताया। चूंकि श्रीधर जी मुझे जानते थे इस वजह से चौंक गये। हिन्दुस्तान टाइम्स के ब्यूरो प्रमुख हसन जी एक मंत्रीजी से मिलने गये। वहां मंत्री जी ने बताया कि आपसे पहले हमारी बात हो चुकी है। यह सुनकर हसन साहब चौंक गये उन्होंने मंत्री जी से कहा कि हम तो आपसे पहली बार मिल रहे हैं कभी बात भी नहीं हुई। पता चला कि कोई व्यक्ति मंत्री जी हिन्दुस्तान टाइम्स का हसन बनकर कई बार बात कर चुका था। दरअसल इन फर्जी पत्रकारों की बाढ आने के लिए वुᆬछ हद तक जिम्मेदार नामी गिरामी पत्रकार व शासन सत्ता में बैठे वुᆬछ आधकारी व नेता हैं। एक महिला जो एक समय में एक राजनीतिक पार्टी में थी इस समय अक्सर एनेक्सी में आती जाती है। वह पत्रकार नहीं है बावजूद इसके उसका पास बना हुआ है। वह वुᆬछ आईएएस अफसरों के दपत्तर में अक्सर देखी जा सकती हैं। अपने को पत्रकार साबित करने के लिए वह कभी कभार मीडिया सेन्टर के भी चक्कर लगा लेती हैं। पत्रकारों की प्रमुख संस्था प्रेस क्लब की हालत इन दिनों अजीब सी हो गयी है। छोटे-मोटे कार्यव्रᆬम भी वहां छुटभैये प्रायोजकों के भरोसे आयोजित होते हैं। यह हालत तब है जब प्रेस क्लब के पास अपना अच्छा खासा फण्ड भी है। हाल में क्लब में तहरी भोज का आायोजन किसी संगठन के सहयोग से सम्पन्न हुआ। पत्रकारों में इसे लेकर बेहद चिन्ता है। मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के पूर्व अध्यक्ष व बीबीसी के विशेष संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी ने जब मुझसे इस घटना का जिव्रᆬ किया तो वे बेहद दुखी थे। मीडिया सेन्टर में मौजूद अन्य पत्रकार भी इस पर बेहद चिन्तित दिखे। ऐसी ढेर सारी घटनाएं हैं जिसे लेकर पत्रकार बिरादरी चिन्तित है। सब चाहते हैं कि कोई ऐसा रास्ता निकले जिससे पत्रकारों की जगह-जगह होने वाली जगहंसाई पर रोक लगायी जा सके। मुझे लगता है कि जल्द ही पत्रकार एक मंच पर आकर इस तरह के फर्जीवाडे पर रोक लगाने की कोशिश करेंगे तभी उनकी साख बच सकेगी।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही सटीक बात कही है आपने देवकी जी. इन लोगों के मारे तो कई बार खुद को पत्रकार कहते हुए शर्म सी आने लगती है.
    इस पर एक राय बनाने की बहुत जरूरत हो गयी है

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