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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

मीडिया का पागलपन

इसे मीडिया का पागलपन नहीं तो और क्या कहेंगे। जब कोई पुरुष तरक्की की ऊंचाईयां छूता है तो तब उसकी तारीफ के पुल बांधने लगता है लेकिन जैसे ही महिला तमाम बाधाओं को दूर करके ऊंचाईयां छूती है तो सब उसके पीछे ही पड जाते हैं। मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया उसकी निजी जीवन में जबरदस्ती की ताक झांक करने लगता है। सबसे पहले उसके चरित्र पर सवाल खडे किये जाने लगते हैं। आईपीएल विवाद में विदेश राज्य मंत्री शशि थुरुर को अपनी वुᆬर्सी गंवानी पडी। उन्होंने तो वुᆬर्सी छोड दी लेकिन उनकी दोस्त सुन्नदा पुष्कर को रोज एक न एक आरोपों से दो चार होना पड रहा है जैसे उनकी शशि थुरुर से जान पहचान होना कोई अपराध है। मीडिया ने उनके चरित्र पर भी सवाल उठाये। परेशान सुन्नदा को यहां तक कहना पडा कि मीडिया ने उनकी बेहद फूहड़  छवि पेश की। आखिर मीडिया को हो क्या गया है। क्या कोई महिला ऊंचाई नहीं छू सकती है? पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के बाद श्रीमती सोनिया गांधी, तमिलनाडू की मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता व यूपी की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती भी तो महिला ही हैं जिन्होंने सफलता के मुकाम अपनी शर्तों पर तय किये हैं। इस पुरुष प्रधान समाज में इन महिलाओं ने देश की अन्य महिलाओं के लिए रास्ता दिखाने का काम किया है। इनके निजी जीवन में झांकने की कभी मीडिया ने कोशिश नहीं की। वजय ये इतनी ताकतवर हैं कि मीडिया के बडे-बडे दिग्गज भी इनके सामने सिर झुकाते हैं। मीडिया के लोग जानते हैं कि बगैर तथ्य के इनके बारे में वुᆬछ भी टिप्पणी की तो उसकी सजा भी उन्हें भुगतनी पड सकती है। शायद यही वजह है कि इनके जीवन में झांकने की कोशिश नहीं कर पाते हैं। वैसे भी हमारे पुरुष प्रधान समाज में किसी भी महिला पर उसके चरित्र को लेकर टिप्पणी करना आजकल का शगल हो गया है। मीडिया भी अब उसमें शामिल हो गया है। मैं भी मीडिया से ही हूं लेकिन मुझे लगता है कि मीडिया को किसी के भी निजी जिन्दगी में झांकने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए और महिलाओं को भी इस तरह की आलोचना से विचलित नहीं होना चाहिए। उन्हें उसी रपत्तार से अपनी तरक्की की रपत्तार को आगे बढाना चाहिए जैसे वह चल रही हैं। अभी हाल में एक कार्यक्रम  में मिस वर्ल्ड डायना हेडेन जी से मुलाकात हुई। डायना हेडेन जी ने बताया कि जब वह 14 साल की थीं तभी उनके पेरेन्ट्स अलग हो गये। डायना के सामने आगे का रास्ता तय करने का मुश्किल भरा सफर था। डायना ने पहले एक कम्पनी में रिसेप्सनस्ट की नौकरी की लेकिन उनकी इच्छा मिस इंडिया का ताज हासिल करने की थी। वह अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आगे बढती रही और मिस वर्ल्ड बनीं। हैदराबाद में उन्हें छुटभैये लोफरों से दिक्कतें भी हुईं लेकिन वह अपने लक्ष्य से डिगी नहीं। महिलाओं के बारे में कोई भी टिप्पणी करना किसी भी पुरुष के लिए बेहद आसान होता है लेकिन मेरा मानना है कि यदि कोई महिला चरित्रहीन होती है तो उसमें पुरुष का बडा योगदान होता है। काल गर्ल के बारे में आधकांश पुरुष चर्चा करते हैं लेकिन यदि पुरुष नहीं होते तो कोई लडकी काल गर्ल क्यों बनती। कई लडकियों को काल गर्ल बनाने में पुरुष का ही योगदान होता है। और जहां तक इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात है वहां तो फिल्मों से ज्यादा कास्टिंग काऊच है। लडकियों को नौकरी देने से लगायत उन्हें प्रोन्नति देने में बडे-बडे सम्पादक उनका शोषण करते हैं। दिल्ली में चैन्ालों के दपत्तर में रोज इस तरह की घटनाएं होती हैं। वास्तविकता यह है कि लडकियां तो मजबूर होकर सम्पादकों के समक्ष अपने को पेश करती हैं। अब सम्पादक इसे अपने तरीके से भी कह सकता है कि फलां लडकी ने नौकरी या प्रमोशन के लिए कम्प्रोमाइज करने से गुरेज नहीं किया। दिल्ली की एक इलेक्ट्रानिक मीडिया के दपत्तर का हाल आपको बताता हूं। इनपुट हेड ने एक महिला रिपोर्टर को महज इसलिए पहले तो रिपोटिर्ग से हटवाया जब वह उनकी तरफ आकर्षित नहीं हुई तो रात की पाली में उनकी ड्यूटी लगा दी। वह पत्रकार मेरे एक जानने वाले की रिश्तेदार थी। मैने अपने जानने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार से हस्तक्षेप करवाया तब जाकर वह जनाब उस महिला का पीछा छोडे। मुझे लगता है कि किसी भी महिला के निजी जीवन में झांकने से पहले मीडिया के साथियों को अपने गिरेबान में एक बार जरुर झांकना चाहिए।

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

हरि के द्वार पर दुनिया का मेला

हरिद्वार यानी हरि का द्वार। विश्व की इस अध्यात्मिक नगरी में १४ अप्रैल को दुनिया का सबसे बडा मेला समाप्त हो गया। वैसे तो तीन माह तक चले इस मेले में देश विदेश के पांच करोड से ज्यादा लोगों ने पतित पावनी गंगा में डुबकी लगाकर अपनी मनोकामना पूरी होने की मिन्नतें की। अंतिम दिन भी ५० लाख से ज्यादा लोग गंगा में स्नान किये। यह ऐतिहासिक छण अब १२ वर्ष बाद आएगा। वैसे तो अर्द्वकुम्भ हर तीन साल पर आता है लेकिन १२ साल पर पूर्णकुम्भ  लगता है। कुम्भ  में शाही स्नान के मौके पर अखाडों के जुलूस पर पूरी दुनिया की नजर रहती है। इस कुम्भ  में तीन लाख से ज्यादा साधु सन्तों ने भी गंगा में डुबकी लगायी। लाखों साधु सन्त तो तीन महीने तक कुम्भनगरी में रुककर तपस्या करते रहे। आलीशान मठों में रहने वाले साधु सन्त तिरपाल के पाण्डाल में वुᆬछ ज्यादा ही प्रसन्न हैं। दिन भर उनके पास भक्तों का आर्शीवाद लेने का तांता लगा रहता है। दोनों वक्त किसी न किसी भण्डारे में शिरकत। शाम को भजन व प्रवचन। इस कुम्भ  में गंगा में डुबकी लगाने का सौभाग्य मुझे भी मिला। कुम्भ  में हर तरफ अलग ही नजारा नजर आ रहा था। अमीर-गरीब सब तिरपाल के पाण्डाल में दरी पर सो रहे हैं। करोडों के कारोबारी कुम्भ में पुण्य कमाने के लिए महीनों से साधु सन्तों की शरण में डेरा डाले हुए हैं। गुजरात से आये एक व्यापारी कहते हैं कि जीवन का जो सुख उन्हें गंगा के किनारे सन्तों के बीच मिल रहा है उन्हें अपनी कोठी में कभी नहीं मिला। उनका पूरा परिवार कुम्भ में स्नान जरुर करता है। मनीष की तरह हजारों करोडपति व्यापारी कुम्भ  में साधु सन्तों की सेवा में लगे हुए हैं। साधु भी अपनी आवभगत से बेहद प्रसन्न हैं। अयोध्या के साधू धरणीधर जी से मेरी मुलाकात वैरागी पाण्डाल में हुई। बकौल धरणीधर जी अयोया से ज्यादा व्यस्तता कुम्भ  में है। रोज किसी ने किसी भण्डारे में जाना पडता है। कई बार एक ही समय पर कई लोग भण्डारा कराना चाहते हैं यह कैसे सम्भव है। कुम्भ  में आने पर लगता है कि देश में कितने धार्मिक लोग हैं। बिन बुलाये करोडों लोग यहां पहुंच रहे हैं। वैरागी आश्रम के एक पाण्डाल में वुᆬछ अलग ही नजारा नजर आया। अंग्रेज भक्त अयोध्या के वुᆬछ साधुओं का पांव धुलकर तौलिया से पोंछ रहे थे। भण्डारा कराया फिर उन्हें दक्षिणा दी। सौ वर्ग किलोमीटर से ज्यादा में बसे कुम्भ नगर में हर तरफ अलग ही नजारा नजर आया। हरि की पैडी का तो महत्व ही अलग है। भारी भीड के बावजूद मुझे हरि की पैडी पर दो दिन स्नान करने का सौभाग्य मिला। हरि की पैडी पर ही एक होटल में मैं ठहरा था। गंगा जी की निर्मल दारा में डुबकी लगाने का आनन्द ही वुᆬछ और है। सुबह के समय तो गंगा जी इतनी शीतलता लिये हुए थी कि पांच मिनट तक पानी में रहना सम्भव नहीं हो पा रहा था। हरि की पैडी पर वैसे तो २४ घंटे स्नान चलता रहता है लेकिन भोर के तीन बजे से रात १२ बजे तक भारी भीड रहती है। शाम को पांच बजते ही आरती दर्शन के लिए लोग स्थान सुरक्षित करने में लग जाते हैं। जरा सी देर हुई तो आरती में जगह नहीं मिलती। वैसे तो आरती ६़४२ बजे प्रारम्भ होती है लेकिन ऐतिहासिक गंगा आरती के लिए घंटों तक लोग इन्तजार करते हैं। विदेशी सैलानियों में भी आरती को लेकर गजब का उत्साह नजर आया। आरती के समय हरि की पैडी पर स्नान रोक दिया जाता है। आरती के बाद भीड छंटते ही फिर गंगा में डुबकी का सिलसिला शुरु हो जाता है। वुᆬम्भ में आने वाले हर व्यक्ति पर नजर रखने के लिए कैमरे तो लगे ही थे २० हजार से ज्यादा पुलिसकर्मी भी तैनात रहे। पहली बार १३० प्रशिक्षु आईपीएस आधकारियों को वुᆬम्भ की व्यवस्था देखने के लिए खास तौर पर हरिद्वार भेजा गया। वैसे तो यहां ३ से ४ लाख लोग साल में ३६५ दिन हरिद्वार में गंगा में डुबकी लगाते हैं लेकिन ५३५ साल बाद लगे इस अदभुद संयोग वाले कुम्भ में भीड के रोज नये रिकार्ड बनते नजर आये। आखिरी तीन दिनों में सवा करोड लोगों के स्नान का अनुमान है। १४ जनवरी २०१० को कुम्भ  का पहला स्नान था। अब तक पांच करोड से ज्यादा लोग गंगा में डुबकी लगा चुके हैं। कुम्भ  को हिन्दुओं का दुनिया का सबसे बडा आयोजन माना जाता है। इतनी बडी संख्या में लोग मक्का में हज के दौरान ही जमा होते हैं। हरिद्वार में इतनी भीड के बावजूद कहीं भी अव्यवस्था नजर नहीं आयी। यह अलग बात रही कि भीड बढने पर वाहनों का आवागमन रोक देने से यात्रियों को दूर तक पैदल जरुर चलना पडा। जय गंगे माता।

बुधवार, 24 मार्च 2010

सुप्रीम कोर्ट ने की गलत व्याख्या-राधा कृष्ण तो नहीं थे लिव इन रिलेशनशिप में

सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को वैध ठहराकर युवाओं को खुश तो कर दिया लेकिन जिस तरह से यह पैᆬसला आया इसने एक नये विवाद को जन्म दे दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पैᆬसले के पीछे राधा व कृष्ण के सम्बन्धों का जिव्रᆬ किया है। अखबारों में छपी रिपोर्ट पर गौर किया जाय तो सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक कृष्ण और राधा भी साथ-साथ रहते थे। मुझे लगता है कि विद्वान न्यायाधीशों की पीठ ने इस बिन्दु पर पौराणिक कथाओं का सही तरह से अवलोकन नहीं किया। रामनवमी से ठीक एक दिन पूर्व 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट का यह महत्वपूर्ण पैᆬसला आया। 24 मार्च को यह पैᆬसला देश के सभी महत्वपूर्ण समाचार पत्रों में छपा। टीवी चैनलों ने भी इस खबर को अपने प्राइम टाइम में चलाया। पूरे दिन पत्रकारों व बुद्विजीवियों के बीच इस पैᆬसले पर चर्चा होती रही। चर्चा की दो धाराएं नजर आयीं लेकिन ज्यादा लोगों की नाराजगी दिखने का कारण था इस पैᆬसले के साथ कृष्ण और राधा के सम्बन्धों को आधार बनाना। जहां तक मेरी जानकारी है कृष्ण और राधा साथ-साथ नहीं रहते थे। कृष्ण से राधा उम्र में 15 साल बडी थीं। कृष्ण की हजारों गोपियों में से राधा एक थी। राधा उनकी खास सखा थां और कहीं भी यह जिव्रᆬ नहीं है कि राधा व कृष्ण साथ-साथ रहते थे। हमारे ब्यूरो प्रमुख विजय शंकर पंकज ने हमारी चर्चा को आगे बढाते हुए राधा व कृष्ण के सम्बन्धों पर विस्तार से जानकारी दी। बकौल पंकज जी राधा व कृष्ण एक ही गांव के रहने वाले थे। राधा शादी शुदा थी लेकिन वह कृष्ण की गोपियों में सबसे खास थी। बावजूद इसके वह जब कभी भी कृष्ण से मिली उनके साथ गांव की अन्य गोपियां भी हुआ करती थी। सबके साथ ही वह रास रचाया करती थी। यह सारे तथ्य पौराणिक कथाओं में वर्णित हैं। लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने पौराणिक कथाओं पर ठीक तरह से गौर नहीं किया और उसे आज के लिव इन रिलेशनशिप के रिश्तों से जोड दिया। लिव इन रिलेशनशिप का मतलब कोई भी बालिग युवक व युवती शादी से पहले ही आपस में न ही शारीरिक सम्बन्ध बना सकते हैं बल्कि साथ रह भी सकते हैं। कानून व पुलिस इन सम्बन्धों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। देश की अदालत जब समलैंगिकता को गलत नहीं मानती तो युवक व युवती के लिव इन रिलेशनशिप को किस तरह से गलत ठहराया जा सकता है। मेरा ऐतराज इस पर है भी नहीं लेकिन मेरा निवेदन है कि लिव इन रिलेशनशिप की सच्चाई को भी अदालतों को देखना चाहिए। किस तरह से युवक व युवतियां लिव इन रिलेशनशिप के नाम पर ठगे जा रहे हैं यह उन हजारों युवक व युवतियों से पूछिए जो इसके शिकार हुए। ऐसा नहीं है कि युवक ही युवती को इस बहाने एक्सप्लायट करके धोखा दे रहे हैं। युवतियां भी अपने साथी को खूब धोखे दे रही हैं। इसे नजदीक से जानने के लिए यूटीवी बिन्दास का शो इमोशनल अत्याचार देखना होगा। आपका पार्टनर आपके प्रति कितना ईमानदार है इस शो को देखने के बाद पता चलता है। लिव इन रिलेशनशिप के कई सम्बन्ध इस टीवी शो के दौरान ही असलियत खुलने के बाद टूट जाते हैं। कोई जरुरी नहीं कि आप अपने जिस दोस्त के साथ कमिटेड रिलेशनशिप में रह रहे हों वह भी उतना ही कमिटेड हो। मुझे लगता है कि समाज की इन सच्चाईयों की रोशनी में पैᆬसले आने चाहिए। क्योंकि देश में कानून से ही लोग थोडा सा डरते हैं।

शनिवार, 6 मार्च 2010

साधुओं की जय हो-मीडिया की भी जय हो

देश की मीडिया में इस समय एक अजीब तरह की बहस छिडी हुई है। कौन बाबा असली और कौन नकली। क्या धर्म है और क्या अधर्म। दिल्ली में इच्छाधारी बाबा की गिरपत्तारी व दक्षिण में स्वामी नित्यानन्द के एक तमिल आभनेत्री के साथ बन्द कमरे का वीडियो सन टीवी द्वारा दिखाये जाने के बाद मीडिया बाबाओं को कटघरे में खडा करने में जुटा हुआ है। टीवी पर लम्बी-लम्बी बहस चल रही है। स्टूडियो में साधुओं के साथ ही समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को बैठाकर चर्चा की जा रही है। इस पूरी बहस के दिलचस्प पहलू पर शायद कुछ  ही लोगों ने गौर किया होगा। एक घंटे की बहस में लम्बे-लम्बे ब्रेक के अलावा नित्यानन्द स्वामी जी का लम्बा फुटेज  व इच्छाधारी बाबा का नृत्य करने की फुटेज  ज्यादा दिखायी जा रही है। बहस तो हो रही है लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रही है। मैने कई चैनलों पर इस मुद्दे पर होने वाली बहस पर गौर किया लेकिन किसी पर भी बहस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। चैनल वाले यह कह सकते हैं कि बहस में शामिल लोग किसी एक मुद्दे पर एकमत नहीं हो सके। एक चैनल पर तो स्वामी रामदेव जी ने कह दिया कि पाखण्डी बाबाओं को फांसी पर लटका देना चाहिए। श्रीश्री रविशंकर ने भी कहा कि सन्त कहने वाले फर्जी लोगों को सजा मिलनी चाहिए। चैनल के एंकर बार-बार यही कहते रहे कि लोग कैसे नकली व असली सन्त के बीच पहचान करें। मुझे लगता है कि समाज इस बारे में पूरी तरह से जागरुक है। तभी तो आसाराम बापू पर पिछले दो वर्ष से हत्या के आरोप लग रहे हैं लेकिन उनके भक्तों की संख्या में कोई कमी नहीं आयी। सत्य साई बाबा पर बच्चों के यौन शोषण के साथ चमत्कार करने के तमाम आरोप मीडिया ने लगाये लेकिन भक्तों की तादात कम नहीं हुई। अपने को भगवान घोषित करने वाले लाडेसर महराज से मेरी कई बार मुलाकात हुई। बाराबंकी के सांसद पी़एल़पुनिया जी मेरे सामने ही पहली बार अपनी धर्मपत्नी के साथ लाडेसर महराज से उनके गोमतीनगर स्थित आश्रम में मिले थे। पुनिया जी ने उनसे अपनी राजनीतिक इच्छा का इजहार करते हुए उसमें सफलता के बारे में पूछा था। बाबा ने उन्हें राजनीति में पूरी सफलता मिलने की बात कही थी। बाबा ने यह पुनिया जी के रिटायरमेंट के फौरन बाद कहा था। जबसे मीडिया उनके पीछे पडी लाडेसर महराज ने पूरे देश में अपना भ्रमण कार्यव्रᆬम बन्द कर दिया। अब वे अपने पुष्कर आश्रम में ही रहते हैं। अभी भी उनके भक्तों की तादात कम नहीं हुई है। हजारों लोग लाडेसर महराज के दर्शन के लिए पुष्कर आश्रम में जुटते हैं। रोज शाम का बाबा जी दर्शन करते हैं।

मेरा मानना है कि मीडिया को साधु सन्तों या किसी भी मामले में मीडिया ट्रायल नहीं करना चाहिए। सन्त व सन्यासी होने का मतलब यह कत्तई नहीं है कि वह ब्रम्हचर्य का पालन करे। कई सन्यासी हैं जो वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। यह जरुर है कि सन्त व सन्यासी को हमारा समाज मार्गदर्शक मानता है। सन्त जो भी बताते हैं उसका हम पालन करते हैं। ऐसे में सन्तों को अपनी मर्यादा का ख्याल जरुर करना चाहिए क्योंकि पूरी दुनिया की नजर उन पर रहती है। वैसे जो भी लोग सामाजिक जीवन जीते हैं उन्हें यह ख्याल रखना चाहिए कि उनके छोटे से कृᆬत्य से समाज पर कितना खराब असर पडता है। पूरे समुदाय की बदनामी होने लगती है। लेकिन मीडिया को भी इन बातों को दिखाने के लिए टीआरपीके चक्कर में पडने की बजाय जांच रिपोर्ट आने तक का इंतजार जरुर करना चााहए। स्वामी नित्यानन्द की जो पुᆬटेज टीवी पर दिखायी जा रही है उसमें तमिल आभनेत्री के अलावा उस कमरे में दो अन्य व्यक्ति भी दिखायी दे रहे हैं। ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि नित्यानन्द आभनेत्री के साथ किसी तरह के सम्बन्ध बना रहे थे। दिल्ली के इच्छाधारी बाबा के आश्रम से कोई काल गर्ल नहीं पकडी गयी लेकिन उसे काल गर्ल का सौदागर बता दिया गया। पुलिस ने कहा और मीडिया ने मान लिया। इच्छाधारी बाबा का नृत्य करता हुआ एक वीडियो भी खूब दिखाया जा रहा है। उस वीडियो में बाबा किसी महिला के साथ तो दिखते नहीं हैं। बताया गया कि बाबा के 500 काल गर्ल से जानपहचान है लेकिन किसी एक को सामने लाकर पुलिस पेश नहीं कर पायी। इच्छाधारी बाबा हास्पीटल चलाते हैं। जहां तक मेरी जानकारी है यह हास्पीटल सेवा भावना से चलाया जा रहा है। यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि जिस बाबा के इतने सारे भक्त हैं वह काल गर्ल का रैकेट क्यों चलायेगा। इसकी जानकारी उनके किसी भक्त को नहीं हो पायी। बाबा ने अपने बयान में जो कहा कि उन्हें फंसाया गया। ऐसा हो भी सकता है, लेकिन अब तो पुलिस व मीडिया ने उन्हें देश में काल गर्ल का सबसे बडा सौदागर घोषित कर दिया है। किसी भी हत्या करने वाले को तब तक मीडिया में हत्यारा नहीं लिखा जाता है जब तक कोर्ट उस पर आरोप नहीं तय कर देती है। मुझे लगता है कि इसी तरह इन बाबाओं के बारे में भी होना चाहिए। पुलिस अगर चार्जशीट दायर करती है और उस पर अदालत किसी भी आरोप में बाबा पर आरोप तय करती है तो उसे कानून के तहत सजा मिलनी चाहिए। यह जरुर है कि इधर साधु सन्तों की देश में बाढ आ गयी है। सन्तों के पास वुᆬछ ही दिनों में अरबों रुपये की सम्पत्ति भी जमा हो जाती है। लोगों को यह देखना होगा कि आखिर बाबा के पास यह करोडों की सम्पत्ति कहीं से आयी? सरकारी मशीनरी को भी इस पर नजर रखनी चाहिए। आम लोगों को भी सन्तों पर भरोसा थोडा जांच परख कर करना चाहिए। मीडिया को धार्मिक मामलों में थोडा संयम बरतना चाहिए।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

वाह रे सचिन तूने कमाल कर दिया

बुधवार को ग्वालियर में सचिन ने वनडे मैन में 200 रन बनाकर साबित कर दिया है वह भारत ही नहीं दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाडी हैं। सचिन को बहुत-बहुत बधाई। सचिन को पूरी दुनिया से बधाईयों का तांता लगा हुआ है। राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री ने भी सचिन की इस कामयाबी पर उन्हें बधाई दी। मुझे लगता है हर व्रिᆬकेट प्रेमी सचिन की इस कामयाबी से अपने को किसी न किसी रुप में जोडना चाह रहा होगा। टीवी चैनलों पर सचिन के इस कामयाबी पर घंटों तक स्टूडियो में चर्चा होती रही। दुनिया भर के खिलाडियों ने सचिन को व्रिᆬकेट का किंग कहा। सचिन रमेश तेंदुलकर को प्रख्यात खिलाडी सुनील गावस्कर व कपिलदेव ने व्रिᆬकेट का महानतम बल्लेबाज कहा। सचिन 16 साल की उम्र से व्रिᆬकेट खेल रहे हैं। रिकार्ड के साथ रहना उनकी अदा है। वन डे मैच में तो सचिन ने सभी रिकार्ड अपने नाम कर रखे हैं। वन डे में सर्वाधिक शतक व सर्वाधिक रन बनाने के साथ ही सबसे ज्यादा मैन आफ द मैच व सर्वाधिक मैन आफ द सिरीज का खिताब भी सचिन के नाम दर्ज है। ग्वालियर का मैच शायद ही सचिन व उनके प्रशंसक कभी भूल पाएंगे। 147 गेंद में नाबाद 200 रन बनाने के लिए 25 चौके व 3 छक्के लगाये। विशेषज्ञ तो लोकप्रियता में फिल्मी दुनिया की हस्ती शाहरुख खान से भी सचिन को आगे बता रहे हैं। वास्तव में सचिन हैं ही ऐसे की कोई भी उनकी तारीफ किये नहीं रह सकता। मूर्धन्य पत्रकार स्व़ प्रभाष जोशी जी जीवित होते तो जनसत्ता में सचिन की इस कामयाबी पर पृथम पृष्ठ पर उनका विशेष लेख जरुर होता। व्रिᆬकेट प्रेमियों को सचिन की इस सफलता पर प्रभाष जी की टिप्पणी से महरुम रहना पडेगा। सचिन जितने महान बल्लेबाज हैं व्यक्तिगत तौर पर भी उतना ही सरल व्यक्तित्व है उनका। मेरी सचिन रमेश तेंदुलकर से एक बार लम्बी मुलाकात हुई। कानपुर में पाकिस्तान के साथ वन डे मैच के बाद सचिन व उनकी पूरी टीम मेरे साथ ही लखनऊ  आयी थी। सचिन के लखनऊ आने के लिए सहारा इण्डिया परिवार ने विशेष तौर पर सोनाटा गोल्ड कार भेजा था। लैण्डमार्क होटल से निकलने के बाद मैने उनसे उसी कार में बैठने का अनुरोध किया। सचिन ने कहा कि मैं अपने साथी खिलाडियों के साथ ही बस से ही चलूंगा। सचिन ने कहा वह बस में गेट के किनारे वाली पहली सीट पर किनारे बैठेगें। सचिन बेहद शालीन हैं और लोगों से बहुत कम बातचीत करते हैं। बस में बैठने के बाद उन्होंने कान में हेडफोन लगा लिया और आईपाड से गाना सुनने लगे। रास्ते में तमाम लोग सडक के किनारे खडे थे जो सचिन की एक झलक पाना चाहते थे। जहां कहीं भी भीड सचिन ने देखी खिडकी का शीशा थोडा हटाकर हाथ जरुर हिलाते। लखनऊ पहुंचने के बाद सहारा शहर में सचिन ने डिनर के दौरान ज्यादा समय अकेले में ही गुजारा। सबसे मिलने के बाद सचिन ने कहा कि उन्हें किनारे बैठना है। महेन्द्र सिंह धोनी ने उस समय सचिन के बारे में कहा था उन्हें अकेलापन अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि वे हर समय बल्लेबाजी की ट्रिक के बारे में ही चिन्तन करते रहते हैं। वाह रे सचिन तुम ऐसे ही खेलते रहो ।

कैसे-कैसे पत्रकार

 उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ को पटना व दिल्ली के बाद पत्रकारों का गढ कहा जाता है। राजधानी होने की वजह से यहां पर पत्रकारों की एक बडी फौज है। तीन सौ से ज्यादा पत्रकारों को राज्य सरकार ने बाकायदे राज्य मुख्यालय की मान्यता दे रखी है। जिले स्तर पर भी करीब 50 पत्रकारों को मान्यता दी गयी है। प्रमुख दैनिक व साप्ताहिक समाचार पत्रों व टीवी चैनल के अलावा इस शहर में कितने समाचार पत्र महज कागजों में छप रहे हैं हो सकता है सूचना विभाग को भी इनके बारे में न पता हो। किसी को पत्रकार बनने के लिए कोई डिग्री की जरुरत नहीं है। जो चाहे वह आसानी एक समाचार पत्र का पंजीकरण कराकर खुद को सम्पादक घोषित कर ले। सरकार भी उसे ऐसा करने से नहीं रोक सकती है। पत्रकारों की बढती भीड से पूरी पत्रकार बिरादरी चिन्तित है। कहा जा रहा है कि इस भीड की वजह से पत्रकारों का समाज में स्तर गिर रहा है। पत्रकारों को लोग अब अच्छी नजर से नहीं देख रहे हैं, यह निहायत ही चिन्तनीय है। किसी सडक पर खडे होकर दस मिनट तक नजर दौडायें तो देखेंगे वहां से गुजरने वाली दस गाडियों में से एक पर प्रेस लिखा हुआ रहता है। अपराध की एक पत्रिका निकालने वाले एक सम्पादक ने कितनी गाडियों पर पत्रिका का नाम छपवा रखा है शायद उन्हें भी नहीं पता होगा। इसी तरह तमाम पत्रकार अपने नाते रिश्तेदारों व मित्रों की गाडियों पर प्रेस लिखवा दिये हैं ताकि पुलिस कहीं उन्हें न रोके। यदि कहीं पर पुलिस रोकने की कोशिश करती है तो पत्रकार का रौब अलग गांठते हैं। मेरे एक पत्रकार मित्र आसिफ की गाडी से हजरतगंज में एक गाडी से पिछले दिनों मामूली टक्कर हो गयी। आसिफ को उस प्रेस लिखी गाडी पर बैठा व्यक्ति पत्रकार का रौब गांठकर आधे घंटे से ज्यादा देर तक परेशान कियाा। बाद में जब असलियत खुली तो पता चला कि वह खुद नहीं बल्कि उसका कोई जानने वाले एक पत्रिका निकालते हैं। वुᆬछ छुटभैये फर्जी पत्रकार नामी गिरामी पत्रकारों का नाम लेकर लोगों को धमकाने से भी नहीं चूकते। एशियन ऐज की विशेष संवाददाता आमता वर्मा के साथ घटी घटना महज एक बानगी है। एक पत्रकार ने एचसीएल कम्पनी की पत्रकार वार्ता में अपने को एशियन ऐज का पत्रकार बता दिया। यही नहीं एक एक व्यक्ति अपने को एशियन ऐज का पत्रकार बताकर इसी शहर में एक मकान पर कब्जा कर लिया था। बाद में इसकी शिकायत एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल से की गयी तब मामला सुलटा। इस तरह की एक घटना तो मेरे साथ भी घटी। मेरे पत्रकार मिश्र श्रीधर जी एक बार कानपुर से लौट रहे थे। चारबाग स्टेशन पर उन्होंने एक व्यक्ति की स्वूᆬटर से लिपत्ट ली। स्वूᆬटर वाले व्यक्ति ने अपने को राष्ट्रीय सहारा का पत्रकार देवकी नन्दन मिश्र बताया। चूंकि श्रीधर जी मुझे जानते थे इस वजह से चौंक गये। हिन्दुस्तान टाइम्स के ब्यूरो प्रमुख हसन जी एक मंत्रीजी से मिलने गये। वहां मंत्री जी ने बताया कि आपसे पहले हमारी बात हो चुकी है। यह सुनकर हसन साहब चौंक गये उन्होंने मंत्री जी से कहा कि हम तो आपसे पहली बार मिल रहे हैं कभी बात भी नहीं हुई। पता चला कि कोई व्यक्ति मंत्री जी हिन्दुस्तान टाइम्स का हसन बनकर कई बार बात कर चुका था। दरअसल इन फर्जी पत्रकारों की बाढ आने के लिए वुᆬछ हद तक जिम्मेदार नामी गिरामी पत्रकार व शासन सत्ता में बैठे वुᆬछ आधकारी व नेता हैं। एक महिला जो एक समय में एक राजनीतिक पार्टी में थी इस समय अक्सर एनेक्सी में आती जाती है। वह पत्रकार नहीं है बावजूद इसके उसका पास बना हुआ है। वह वुᆬछ आईएएस अफसरों के दपत्तर में अक्सर देखी जा सकती हैं। अपने को पत्रकार साबित करने के लिए वह कभी कभार मीडिया सेन्टर के भी चक्कर लगा लेती हैं। पत्रकारों की प्रमुख संस्था प्रेस क्लब की हालत इन दिनों अजीब सी हो गयी है। छोटे-मोटे कार्यव्रᆬम भी वहां छुटभैये प्रायोजकों के भरोसे आयोजित होते हैं। यह हालत तब है जब प्रेस क्लब के पास अपना अच्छा खासा फण्ड भी है। हाल में क्लब में तहरी भोज का आायोजन किसी संगठन के सहयोग से सम्पन्न हुआ। पत्रकारों में इसे लेकर बेहद चिन्ता है। मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के पूर्व अध्यक्ष व बीबीसी के विशेष संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी ने जब मुझसे इस घटना का जिव्रᆬ किया तो वे बेहद दुखी थे। मीडिया सेन्टर में मौजूद अन्य पत्रकार भी इस पर बेहद चिन्तित दिखे। ऐसी ढेर सारी घटनाएं हैं जिसे लेकर पत्रकार बिरादरी चिन्तित है। सब चाहते हैं कि कोई ऐसा रास्ता निकले जिससे पत्रकारों की जगह-जगह होने वाली जगहंसाई पर रोक लगायी जा सके। मुझे लगता है कि जल्द ही पत्रकार एक मंच पर आकर इस तरह के फर्जीवाडे पर रोक लगाने की कोशिश करेंगे तभी उनकी साख बच सकेगी।