देश में एक और आतंकवादी हमला ७ सितम्बर को हो गया. दिल्ली हाईकोर्ट में रखे टाइम बम में विस्फोट हुआ और १३ लोग मारे गये ८० से ज्यादा घायल हो गये. देश में यह पहली बार नहीं हुआ. अकेले दिल्ली में पिछले पांच साल में ६ आतंकवादी हमले हो चुके है. हमले के बाद उसके गुनहगारो को तो हम देर सबेर पकड लेते है लेकिन फिर हमले न हो यह रोक पाना हमारे लिये नामुमकिन सा नज़र आ रहा है. अमरीका में एक ९/११ हुआ उसके बाद कोई आतंकवादी हमले का साहस नहीं जूठा पाया. अमरीका ने हमला करने वाले ओसामा को पाकिस्तान में मार गिराया. हम ऐसा नहीं कर सकते है लेकिन अपनी सुरछा तो कर सकते है ताकि कोई आतंकवादी हमला नहीं कर पाये. संसद से लेकर टी वी चैनलों तक लम्बी लम्बी बहस हो रही है लेकिन इन हमलो के लिये जिम्मेदार कौन है इसका पता नहीं चल पा रहा है. सरकार पर आरोप लग रहे है लेकिन कोई यह नहीं कह रहा है कि मोटी तनख्वाह लेने वाले पुलिस और खुफिया एजेंसियों के अफसर क्या कर रहे थे जिनकी इन हमलो को रोकने कि जिम्मेदारी थी. खुफिया एजेंसियों के अफसर क्या कर रहे थे. उन्हें क्यों दिल्ली में घुसे आतंकवादियों के बारे में नहीं पता चल पाया और अगर उन्हें पता था तो पुलिस उन्हें हमले से पहले पकड़ क्यों नही पकड़ पायी? अगर ये अफसर इतने नकारे हो गये है तो इनके खिलाफ क्यों कारवाई नहीं हो रही है. मेरे हिसाब से जब तक इन पर चाबुक नहीं चलेगा तब तक इस तरह कि वारदातों को रोकना आसन नहीं होगा. यह्ना आपको उत्तर प्रदेश पुलिस का उदाहरन देना चाहूँगा. अगर किसी थाना छेत्र में कोई घटना हो गई तो उसके खुलासे कि जिम्मेदारी वहा के थानेदार कि होती है. घटना होने के लिये भी उसे ही जिम्मेदार ठहराया जाता है. थानेदार को अपने खिलाफ कारवाई का भय रहता है और पूरी शिद्दत के साथ लगा रहता है. आतंकवादियों को रोकने के लिये सीमा के अलावा पूरे देश में भारी भरकम पुलिस अफसर तैनात है लेकिन नतीजा सिफर है. वजह इनकी कोई भी जवाबदेही नहीं है. कोई सूचना मिल गई तो भी ठीक नहीं मिली तो भी कोई बात नहीं. कभी इनकी कोई भी जवाबदेही नहीं रहती है. अलबत्ता इन पर लोगो को उठाकर छोड़ देने के नाम पर उगाही के आरोप भी खूब लगते रहते है.सरकार इनको जवाबदेह क्यों नहीं बना रही है यह समझ से परे है. नेताओ का मेरे समझ से इन मामलों से कोई लेना देना नहीं है वो तो वही बोलते है जितना ये पुलिस अफसर बताते है उन्हें क्या पता है कि गडबडी कहा हो रही है. अमरीका ने ९/११ के बाद अपने पुलिस अफसरों को साफ कर दिया था उन्हें अब हमले नही चाहिए तुम चाहे जो भी करो और वे जी जान से लग गये. इक टीम ओसामा कि तलाश में लग गई और दूसरी आतंकवादियों के हमलो के रास्तो को रोकने में जुट गई. उन्हें इसका फायदा भी मिला आंकवादी अमरीका में दोबारा हमले का रास्ता नहीं निकल पाये जबकि उनके आका को भी उनके घर में घुसकर उसने मार गिराया. हम अपने पुलिस को जवाबदेह क्यों नहीं बना पा रहे है आखिर कौन रोक रहा है हमारी सरकार को. आतंकवादी सेल में तैनात जो पुलिस वाले मलाई काट रहे है उनकी जवादेही तय कि जाय तभी हम इसे रोक पाएंगे. अगर मोजुदा टीम कुछ नहीं कर पा रही है तो उसे हटाया जाय निलम्बित किया जाय नई टीम लगायी जाय तभी हमले रुक सकते है. आतंकवादियों को भारतीय पुलिस का खोफ नहीं रहा है जिस तरह का अमरीका पुलिस का है. खोफ पैदा करना होगा उनमे तब डरेंगे और ये पुलिस ही कर पायेगी और पुलिस पर सरकार कि कारवाई का खोफ.....जय हिंद
आप सोच रहे होंगे कि इस पत्रकार को ब्लाग लिखने की जरुरत क्यों आन पडी, जब इसके पास लिखने के लिए पहले से एक प्रमुख समाचार पत्र व टेलीविजन है। आपकी सोच ठीक है लेकिन मेरा मानना है कि अपनी ढेर सारी भावनाएं व विचार हम उस समाचार पत्र में नहीं लिख सकते। इसके लिए इण्टरनेट ब्लाग मुझे बेहतर माध्यम लगा। मेरे ब्लाग पर अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएंगे तो मुझे प्रसन्नता होगी साथ ही आपके सुझावों से इसमें बदलाव करने में यूपी के इस बन्दे को सहूलियत होगी।
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शुक्रवार, 9 सितंबर 2011
सोमवार, 15 नवंबर 2010
रविवार, 7 नवंबर 2010
वाह रे ओबामा
अमरीका को दुनिया का सबसे ताकतवर देश कहा जाता है़ किसी भी देश की हिम्मत नहीं है कि उसके सामने सिर उठा सके़ चार साल पहले अमरीका के राष्ट्रपति जार्ज बुश भी भारत के दौरे पर आये थे और आज बराक ओबामा़ दोनों ही दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति हैं लेकिन तब और अब में काफी फर्क आ गया है़ तब जार्ज बुश के सामने हमारे कोई खास हैसियत नहीं थी लेकिन इस बार ओबामा ने भारत को अपना दोस्त कहा़ भारत को अमरीका के बराबर का दर्जा दिया़ इसका मतलब यह कत्तई नहीं लगाया जाना चाहिए कि अमरीका ने भारत के सामने घुटने टेक दिये अपने देश के बेरोजगारों को रोजगार दिलाने के लिए़ जैसा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के हमारे साथी शोर मचा रहे हैं. हमें इस बात को समझना चाहिए कि अमरीका की ताकत हमसे कई गुना ज्यादा है़. जिस जहाज में अमरीका का राष्ट्रपति यात्रा करता है उस तरह का जहाज भारत को हासिल करने में अभी कितना वक्त लगेगा नहीं कहा जा सकता है़ हम भारतीयों को ओबामा के इस कदम की तारीफ करते हुए उनके साथ कदमताल करना चाहिए़ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस बात को समझ गये हैं लेकिन लगता है देश के मीडिया के बंधु इसे नहीं समझना चाहते हैं़ यही वजह है कि मनमोहन सिंह खुद ओबामा के स्वागत के लिए एयरपोर्ट पर अपनी पत्नी के साथ गये़ यह इस देश के लिए एक बड्ी घटना है़ ओबामा की यात्रा को लेकर पूरी मीडिया सिर्फ पाकिस्तान को केन्द्र में देख रही है़ मेरा सवाल है कि क्या ओबामा सिर्फ पाकिस्तान पर बात करने के लिए भारत की यात्रा पर आये हैं? अमरीका के साथ औद्योगिक समझौता होना क्या कम है़ मुम्बई के सेंट जेवियर्स कालेज के छात्रों के सवाल के जवाब में ओबामा ने बहुत अच्छी बात कही पाकिस्तान की तरक्की और खुशहाली में भारत का भी भला है़ ओबामा ने यह भी कहा कि पाकिस्तान में कुछ लोग हैं जो आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं. पाकिस्तान सरकार उन पर अंकुश नहीं लगा पा रही है शायद यही वजह है कि पाकिस्तान भी आतंकवाद का उतना ही शिकार है जितना भारत व अन्य देश़ भले ही अमरीका पाकिस्तान को आर्थिक मदद करता हो लेकिन वह खुद भी चाहता है कि आतंकवादियों का पाकिस्तान से खात्मा होक़्योंकि अमरीका भी आतंकवाद का कम दंश नहीं झेल रहा है़ 9/11 की घटना को शायद ही अमरीका भुला पा रहा हो़ हमें यह समझना होगा कि कई बार हमारी जो भी प्राथमिकता होती है वह हमारे किसी दोस्त की नहीं होती है़ ओबामा का भारत से कुछ ज्यादा ही लगाव नजर आ रहा है, मुझे नहीं लगता है कि इतना लगाव ओबामा का पाकिस्तान के साथ होगा़ कुछ राजनीतिक मजबूरियां भी हो सकती हैं पाकिस्तान के आर्थिक सहयोग में़हम इस बात को क्यों नहीं समझते हैं कि पाकिस्तान हमारी समस्या है़ हमें ही इस समस्या से खुद ही निपटना होगा़ वैसे भी हम क्या कम ताकतवर हैं जो पाकिस्तान से टक्कर लेने के लिए अमरीका का सहयोग लेंगे़ भारत की नीति हमेशा से पाकिस्तान का विवाद बातचीत के जरिए सुलझाने की रही है़ यह एक अच्छी बात है़ ओबामा जिनको अपने जीवन का आदर्श मानते हैं गांधी उनके भी कुछ ऐसे ही विचार थे़ गांधी जी आहंसा के पुजारी थे़ गांधी जी ने अंग्रेजों को भगाने में भी हमेशा से आहंसा का सहारा लिया़ जहां कहीं भी हिंसा हुई गांधी जी ने हमेशा उसको कण्डम किया थाग़ांधी जी के ही शिष्य हैं ओबामा़ फिर वे अगर बातचीत की पेशकश कर रहे हैं तो व्ात्या बुराई है़ मैने तो गांधी को नहीं देखा और न मिला लेकिन जितना उनके बारे में जाना और समझा है वास्तव में गांधी जैसे लोगों को भी भगवान कहा जाता है़ मुझे लगता है कि ओबामा की यह भारत यात्रा पाकिस्तान मुद्दे के अलावा पूरी दुनिया में यह संदेश देने में सफल होगी कि भारत भी अब ताकतवर हो गया है़ भारत अब पिछलग्गू देश नहीं रहा़ अमरीका जैसे विश्व का सबसे ताकतवर देश अब उसे अपना दोस्त जो बता रहा है़.
शुक्रवार, 7 मई 2010
फांसी को लेकर राजनीति बन्द करो
17 महीने के कम समय में अजमल आमिर कसाव को फांसी की सजा तो सुना दी गयी लेकिन उसे फांसी होने में 17 साल लग जायं तो इसमे किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कसाव की फांसी पर पूरे देश ने खुशी तो जाहिर की लेकिन मुझे लगता है कि असली खुशी तभी मिलेगी जब उसे फांसी पर लटका दिया जाय। फांसी पर लटकाये जाने का पुराना जो रिकार्ड रहा है उससे लगता नहीं कि कसाव को जल्द फांसी मिल पाएगी। संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को भी फांसी सुनायी जा चुकी है लेकिन चार साल से ज्यादा का समय गुजर गया उस पर निर्णय नहीं हो पााया। न्यायपालिका ने तो अपना काम पूरा कर दिया लेकिन अब सरकार अपना काम नहीं कर पा रही है। ऐसे में यह कैसे माना जाय कि सरकार वास्तव में आतंकवाद को रोक पायेगी। वैसे तो हमारे देश में फांसी पर अंतिम निर्णय होने में लम्बा वक्त लगता है लेकिन यदि मामला किसी खास कम्युनिटी का होता है फिर तो वोट बैंक भी प्रभावित होने लगता है। वर्ष 2004 में धनन्जय चटर्जी के बाद भारत में किसी को फांसी नहीं दी गयी। 308 लोगों को मौत की सजा सुनायी जा चुकी है। 29 लोगों की मर्सी अपील राष्ट्रपति के यहां पडी है। राष्ट्रपति को सब काम की फुर्सत तो है लेकिन जिससे अपराधियों पर कानून का भय पैदा करना है उस पर निर्णय लेने की फुर्सत लगता है उन्हें नहीं है। जब किसी को फांसी पर नहीं लटकाना है फिर फांसी की सजा सुनाने की कोर्ट को जरुरत क्या है? आतंकवादी अफजल गुरु को फांसी पर लटकाने को लेकर राजनीतिक दलों में जबरदस्त रस्साकसी चल रही है। कसाव के मामले में इनका रवैया थोडा अलग नजर आ रहा है। देश के मुसलमानों का नजरिया भी थोडा बदला है। मुझे लगता है कि कसाव यदि हिन्दुस्तानी होता तो देश के मुसलमानों का नजरिया अफजल गुरु जैसा ही होता। यहां देश के मुसलमानों को ध्यान रखना होगा कि आतंकवादी की कोई जाति व धर्म नहीं होता है। यह अलग बात है कि जेहाद के नाम पर चन्द मुसलमान पूरी दुनिया में आतंकवाद को फिला रहे हैं। पाकिस्तान उनकी अगुवाई कर रहा है लेकिन भारत के मुसलमानों को यह ध्यान रखना चाहिए कि देश में जब भी आतंकवादी हमला होता है उस समय हिन्दु व मुसलमान दोनों की जान जाती है। आतंकवादी हिन्दुओं को भी टार्गेट करके हमला नहीं करते हैं। आतंकवादी अफजल गुरु हो या कसाव दोनों को फांसी जल्दी दी जाय इसके लिए देश के मुसलमानों को आगे आना चाहिए। माहौल खडा करके सरकार पर मर्सी अपील पर जल्द निर्णय का दबाव बनाना चाहिए। यही कदम देश हित में है और देशवासियों के भी। मेरा मानना है कि सरकार को भी फांसी की सजा पाने वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति को भी समझ करके जल्द निर्णय लेना चाहिए। जिस किसी व्यक्ति को फांसी की सजा सुना दी जाती है वह हर रोज तिल-तिल कर मरने का एहसास करता है। उसे भी समझ में नहीं आता कि कल क्या होने वाला है। मानसिक हालत खराब होने पर वह गम्भीर बीमार भी पड सकता है। ऐसी स्थिति में जेल के सामने एक नई तरह की समस्या खडी हो सकती है। दूसरी तरफ कसाव व अफजल जैसे आतंकवादियों को फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद उनकी सुरक्षा पर करोडों का खर्च भी सरकार कर रही है। यह खर्च तो अनायास ही लगता है। यह खर्च कब तक होगा किसी को नहीं पता। मुझे लगता है कि फांसी पर राजनीति बन्द हो जाय तो अपराधियों में फांसी का खौफ जरुर पैदा होगा जो न्याय की मंशा भी है।
शनिवार, 24 अप्रैल 2010
मीडिया का पागलपन
इसे मीडिया का पागलपन नहीं तो और क्या कहेंगे। जब कोई पुरुष तरक्की की ऊंचाईयां छूता है तो तब उसकी तारीफ के पुल बांधने लगता है लेकिन जैसे ही महिला तमाम बाधाओं को दूर करके ऊंचाईयां छूती है तो सब उसके पीछे ही पड जाते हैं। मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया उसकी निजी जीवन में जबरदस्ती की ताक झांक करने लगता है। सबसे पहले उसके चरित्र पर सवाल खडे किये जाने लगते हैं। आईपीएल विवाद में विदेश राज्य मंत्री शशि थुरुर को अपनी वुᆬर्सी गंवानी पडी। उन्होंने तो वुᆬर्सी छोड दी लेकिन उनकी दोस्त सुन्नदा पुष्कर को रोज एक न एक आरोपों से दो चार होना पड रहा है जैसे उनकी शशि थुरुर से जान पहचान होना कोई अपराध है। मीडिया ने उनके चरित्र पर भी सवाल उठाये। परेशान सुन्नदा को यहां तक कहना पडा कि मीडिया ने उनकी बेहद फूहड़ छवि पेश की। आखिर मीडिया को हो क्या गया है। क्या कोई महिला ऊंचाई नहीं छू सकती है? पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के बाद श्रीमती सोनिया गांधी, तमिलनाडू की मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता व यूपी की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती भी तो महिला ही हैं जिन्होंने सफलता के मुकाम अपनी शर्तों पर तय किये हैं। इस पुरुष प्रधान समाज में इन महिलाओं ने देश की अन्य महिलाओं के लिए रास्ता दिखाने का काम किया है। इनके निजी जीवन में झांकने की कभी मीडिया ने कोशिश नहीं की। वजय ये इतनी ताकतवर हैं कि मीडिया के बडे-बडे दिग्गज भी इनके सामने सिर झुकाते हैं। मीडिया के लोग जानते हैं कि बगैर तथ्य के इनके बारे में वुᆬछ भी टिप्पणी की तो उसकी सजा भी उन्हें भुगतनी पड सकती है। शायद यही वजह है कि इनके जीवन में झांकने की कोशिश नहीं कर पाते हैं। वैसे भी हमारे पुरुष प्रधान समाज में किसी भी महिला पर उसके चरित्र को लेकर टिप्पणी करना आजकल का शगल हो गया है। मीडिया भी अब उसमें शामिल हो गया है। मैं भी मीडिया से ही हूं लेकिन मुझे लगता है कि मीडिया को किसी के भी निजी जिन्दगी में झांकने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए और महिलाओं को भी इस तरह की आलोचना से विचलित नहीं होना चाहिए। उन्हें उसी रपत्तार से अपनी तरक्की की रपत्तार को आगे बढाना चाहिए जैसे वह चल रही हैं। अभी हाल में एक कार्यक्रम में मिस वर्ल्ड डायना हेडेन जी से मुलाकात हुई। डायना हेडेन जी ने बताया कि जब वह 14 साल की थीं तभी उनके पेरेन्ट्स अलग हो गये। डायना के सामने आगे का रास्ता तय करने का मुश्किल भरा सफर था। डायना ने पहले एक कम्पनी में रिसेप्सनस्ट की नौकरी की लेकिन उनकी इच्छा मिस इंडिया का ताज हासिल करने की थी। वह अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आगे बढती रही और मिस वर्ल्ड बनीं। हैदराबाद में उन्हें छुटभैये लोफरों से दिक्कतें भी हुईं लेकिन वह अपने लक्ष्य से डिगी नहीं। महिलाओं के बारे में कोई भी टिप्पणी करना किसी भी पुरुष के लिए बेहद आसान होता है लेकिन मेरा मानना है कि यदि कोई महिला चरित्रहीन होती है तो उसमें पुरुष का बडा योगदान होता है। काल गर्ल के बारे में आधकांश पुरुष चर्चा करते हैं लेकिन यदि पुरुष नहीं होते तो कोई लडकी काल गर्ल क्यों बनती। कई लडकियों को काल गर्ल बनाने में पुरुष का ही योगदान होता है। और जहां तक इलेक्ट्रानिक मीडिया की बात है वहां तो फिल्मों से ज्यादा कास्टिंग काऊच है। लडकियों को नौकरी देने से लगायत उन्हें प्रोन्नति देने में बडे-बडे सम्पादक उनका शोषण करते हैं। दिल्ली में चैन्ालों के दपत्तर में रोज इस तरह की घटनाएं होती हैं। वास्तविकता यह है कि लडकियां तो मजबूर होकर सम्पादकों के समक्ष अपने को पेश करती हैं। अब सम्पादक इसे अपने तरीके से भी कह सकता है कि फलां लडकी ने नौकरी या प्रमोशन के लिए कम्प्रोमाइज करने से गुरेज नहीं किया। दिल्ली की एक इलेक्ट्रानिक मीडिया के दपत्तर का हाल आपको बताता हूं। इनपुट हेड ने एक महिला रिपोर्टर को महज इसलिए पहले तो रिपोटिर्ग से हटवाया जब वह उनकी तरफ आकर्षित नहीं हुई तो रात की पाली में उनकी ड्यूटी लगा दी। वह पत्रकार मेरे एक जानने वाले की रिश्तेदार थी। मैने अपने जानने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार से हस्तक्षेप करवाया तब जाकर वह जनाब उस महिला का पीछा छोडे। मुझे लगता है कि किसी भी महिला के निजी जीवन में झांकने से पहले मीडिया के साथियों को अपने गिरेबान में एक बार जरुर झांकना चाहिए।
बुधवार, 14 अप्रैल 2010
हरि के द्वार पर दुनिया का मेला
हरिद्वार यानी हरि का द्वार। विश्व की इस अध्यात्मिक नगरी में १४ अप्रैल को दुनिया का सबसे बडा मेला समाप्त हो गया। वैसे तो तीन माह तक चले इस मेले में देश विदेश के पांच करोड से ज्यादा लोगों ने पतित पावनी गंगा में डुबकी लगाकर अपनी मनोकामना पूरी होने की मिन्नतें की। अंतिम दिन भी ५० लाख से ज्यादा लोग गंगा में स्नान किये। यह ऐतिहासिक छण अब १२ वर्ष बाद आएगा। वैसे तो अर्द्वकुम्भ हर तीन साल पर आता है लेकिन १२ साल पर पूर्णकुम्भ लगता है। कुम्भ में शाही स्नान के मौके पर अखाडों के जुलूस पर पूरी दुनिया की नजर रहती है। इस कुम्भ में तीन लाख से ज्यादा साधु सन्तों ने भी गंगा में डुबकी लगायी। लाखों साधु सन्त तो तीन महीने तक कुम्भनगरी में रुककर तपस्या करते रहे। आलीशान मठों में रहने वाले साधु सन्त तिरपाल के पाण्डाल में वुᆬछ ज्यादा ही प्रसन्न हैं। दिन भर उनके पास भक्तों का आर्शीवाद लेने का तांता लगा रहता है। दोनों वक्त किसी न किसी भण्डारे में शिरकत। शाम को भजन व प्रवचन। इस कुम्भ में गंगा में डुबकी लगाने का सौभाग्य मुझे भी मिला। कुम्भ में हर तरफ अलग ही नजारा नजर आ रहा था। अमीर-गरीब सब तिरपाल के पाण्डाल में दरी पर सो रहे हैं। करोडों के कारोबारी कुम्भ में पुण्य कमाने के लिए महीनों से साधु सन्तों की शरण में डेरा डाले हुए हैं। गुजरात से आये एक व्यापारी कहते हैं कि जीवन का जो सुख उन्हें गंगा के किनारे सन्तों के बीच मिल रहा है उन्हें अपनी कोठी में कभी नहीं मिला। उनका पूरा परिवार कुम्भ में स्नान जरुर करता है। मनीष की तरह हजारों करोडपति व्यापारी कुम्भ में साधु सन्तों की सेवा में लगे हुए हैं। साधु भी अपनी आवभगत से बेहद प्रसन्न हैं। अयोध्या के साधू धरणीधर जी से मेरी मुलाकात वैरागी पाण्डाल में हुई। बकौल धरणीधर जी अयोया से ज्यादा व्यस्तता कुम्भ में है। रोज किसी ने किसी भण्डारे में जाना पडता है। कई बार एक ही समय पर कई लोग भण्डारा कराना चाहते हैं यह कैसे सम्भव है। कुम्भ में आने पर लगता है कि देश में कितने धार्मिक लोग हैं। बिन बुलाये करोडों लोग यहां पहुंच रहे हैं। वैरागी आश्रम के एक पाण्डाल में वुᆬछ अलग ही नजारा नजर आया। अंग्रेज भक्त अयोध्या के वुᆬछ साधुओं का पांव धुलकर तौलिया से पोंछ रहे थे। भण्डारा कराया फिर उन्हें दक्षिणा दी। सौ वर्ग किलोमीटर से ज्यादा में बसे कुम्भ नगर में हर तरफ अलग ही नजारा नजर आया। हरि की पैडी का तो महत्व ही अलग है। भारी भीड के बावजूद मुझे हरि की पैडी पर दो दिन स्नान करने का सौभाग्य मिला। हरि की पैडी पर ही एक होटल में मैं ठहरा था। गंगा जी की निर्मल दारा में डुबकी लगाने का आनन्द ही वुᆬछ और है। सुबह के समय तो गंगा जी इतनी शीतलता लिये हुए थी कि पांच मिनट तक पानी में रहना सम्भव नहीं हो पा रहा था। हरि की पैडी पर वैसे तो २४ घंटे स्नान चलता रहता है लेकिन भोर के तीन बजे से रात १२ बजे तक भारी भीड रहती है। शाम को पांच बजते ही आरती दर्शन के लिए लोग स्थान सुरक्षित करने में लग जाते हैं। जरा सी देर हुई तो आरती में जगह नहीं मिलती। वैसे तो आरती ६़४२ बजे प्रारम्भ होती है लेकिन ऐतिहासिक गंगा आरती के लिए घंटों तक लोग इन्तजार करते हैं। विदेशी सैलानियों में भी आरती को लेकर गजब का उत्साह नजर आया। आरती के समय हरि की पैडी पर स्नान रोक दिया जाता है। आरती के बाद भीड छंटते ही फिर गंगा में डुबकी का सिलसिला शुरु हो जाता है। वुᆬम्भ में आने वाले हर व्यक्ति पर नजर रखने के लिए कैमरे तो लगे ही थे २० हजार से ज्यादा पुलिसकर्मी भी तैनात रहे। पहली बार १३० प्रशिक्षु आईपीएस आधकारियों को वुᆬम्भ की व्यवस्था देखने के लिए खास तौर पर हरिद्वार भेजा गया। वैसे तो यहां ३ से ४ लाख लोग साल में ३६५ दिन हरिद्वार में गंगा में डुबकी लगाते हैं लेकिन ५३५ साल बाद लगे इस अदभुद संयोग वाले कुम्भ में भीड के रोज नये रिकार्ड बनते नजर आये। आखिरी तीन दिनों में सवा करोड लोगों के स्नान का अनुमान है। १४ जनवरी २०१० को कुम्भ का पहला स्नान था। अब तक पांच करोड से ज्यादा लोग गंगा में डुबकी लगा चुके हैं। कुम्भ को हिन्दुओं का दुनिया का सबसे बडा आयोजन माना जाता है। इतनी बडी संख्या में लोग मक्का में हज के दौरान ही जमा होते हैं। हरिद्वार में इतनी भीड के बावजूद कहीं भी अव्यवस्था नजर नहीं आयी। यह अलग बात रही कि भीड बढने पर वाहनों का आवागमन रोक देने से यात्रियों को दूर तक पैदल जरुर चलना पडा। जय गंगे माता।
गुरुवार, 25 मार्च 2010
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